Monday, July 15, 2019

Полиция жестко разогнала акцию протеста у Мосгоризбиркома. Десятки задержанных

Сотрудники полиции задержали несколько десятков протестующих у здания Мосгоризбиркома. В воскресенье в Москве прошла акция с требованием допустить оппозиционных кандидатов к участию в выборах в Мосгордуму.

Среди задержанных - оппозиционные кандидаты Илья Яшин, Иван Жданов, Любовь Соболь и Юлия Галямина. Задержали также корреспондента телеканала Дождь.

По данным сайта "ОВД-инфо", полиция задержала 38 человек. "Их били по голове и животу, тянули за волосы, некоторые говорят о подозрении на сотрясение мозга и перелом носа", - сообщает правозащитный портал. МВД сообщило о 25 задержанных.

Акция протеста в центре Москвы началась около двух часов дня. Столичные власти отказались согласовать акцию, и она началась в формате "встречи с избирателями".

Протестующие пришли в Новопушкинский сквер, требуя проведения честных и конкурентных выборов в Москве, а также допуска независимых кандидатов к выборам в Мосгордуму.

Затем участники двинулись по Тверской в сторону московской мэрии и Мосгоризберкома. Возле Мосгоризбиркома полиция образовала цепь, но толпа продавила ее. Протестующие встали у входа в здание и скандировали: "Горбунов (глава Мосгоризбиркома), выходи!", "Даёшь честные выборы!" и "Мы не уйдём!"

Часть протестующих устроила "сидячую забастовку" прямо на асфальте, а затем установила четыре палатки.

Полиция в итоге стала охранять только вход в Мосгоризбирком, однако после установки палаток сотрудники правоохранительных органов стали жестко задерживать протестующих.

После жесткого разгона полиция разобрала все палатки и вытеснила участников акции из двора перед зданием Мосгоризбиркома.

"В центре Москвы участники несогласованной акции попытались разбить палаточный лагерь у Мосгоризбиркома. На законные требования сотрудников полиции о прекращении противоправных действий не реагировали, - цитирует РИА Новости заявление МВД. - В связи с чем за совершение административных правонарушений, предусмотренных ст. 20.2 КоАП РФ, были задержаны более 25 человек, в том числе ряд организаторов несогласованной акции".

Friday, July 5, 2019

भारत में ज़्यादा बच्चों की मौत इन राज्यों में ही क्यों

बिहार में 150 से ज़्यादा बच्चों की मौत के बाद देश की स्वास्थ्य व्यवस्था सवालों के घेरे में है. बच्चों के पैदा होने और शुरुआती सालों में जीवित रहने के मामले में भारत दुनिया का सबसे बदतर देश है.

अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका लैंसेट साल 2015 की रिपोर्ट के मुताबिक़ पाँच साल से कम उम्र में सबसे ज़्यादा बच्चों की मृत्यु भारत में हुई.

ये पहले से बेहतर है. साल 2000 से भारत में बच्चों की मृत्यु दर घटकर आधी हो गई है पर 2015 में भी ये आँकड़ा बारह लाख था.

बारह लाख में से आधी मौतें तीन राज्यों में हुईं- उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश. इसकी वजह वहां बसी ज़्यादा आबादी हो सकती है. पर ये क्षेत्रीय स्तर पर भिन्नता को भी दर्शाता है.

साल 2015 में पैदा हुए हर 1,000 बच्चों के लिए मध्य प्रदेश में 62 का मौत हो गई जबकि ये आंकड़ा केरल में सिर्फ़ नौ था. देश में पाँच साल के बच्चों तक की मृत्यु दर का औसत 43 रहा.

कम प्रति व्यक्ति आय वाले प्रदेश जैसे असम, ओडिशा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान अन्य बदतर राज्य थे. ज़्यादा आय वाले तमिलनाडु, महाराष्ट्र, पंजाब और पश्चिम बंगाल में बच्चों की मृत्यु दर कम थी.

केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में मानव विकास से जुड़े मूलभूत ढांचों में निवेश का लंबा इतिहास रहा है.

प्रोफ़ेसर दिलीप मावलंकर इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ़ पब्लिक हेल्थ (गांधीनगर) के निदेशक हैं और देश में स्वास्थ्य व्यवस्था पर शोध, ट्रेनिंग और बहस का हिस्सा रहे हैं.

वो कहते हैं, "कृषि सुधार, महिला सशक्तीकरण, शिक्षा, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, अस्पतालों की बढ़ती संख्या, स्वास्थ्य क्षेत्र और टीकाकरण में निवेश केरल को इस स्तर पर ले आए हैं."

इस सबके अलावा, प्रोफ़ेसर मावलंकर का दावा है कि उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और बिहार जैसे ज़्यादा आबादी वाले राज्यों में स्वास्थ्य व्यवस्था को संचालित करना चुनौती भरा है.

इन राज्यों में कई इलाक़ों में सड़कों की हालत बदतर है. कई गांवों से प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और अस्पतालों तक पहुंचना मुश्किल है जिससे उपचार में देरी हो जाती है.

स्वास्थ्य मंत्रालय मानता है कि "संचालन में दिक्क़तें हैं" और इन राज्यों की "कमज़ोर स्वास्थ्य व्यवस्था बच्चों के पैदा होने के व़क्त ज़रूरी सुविधाओं पर असर डालती है".

साल 2017 में भारत पर यूनीसेफ़ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, पैदा होने के पहले महीने में बच्चों की मौत की सबसे बड़ी वजहें थीं पैदा होने के व़क्त होने वाली कॉम्प्लिकेशन (जटिलताएं) और समय से पहले प्रसव.

ये कोई महामारी नहीं, बल्कि ऐसी वजहें हैं जिनसे मौत ना होतीं अगर मां और बच्चों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं मिल पातीं.

इसी मक़सद के साथ साल 2005 में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन का गठन किया गया ताकि गांवों के अलावा आठ राज्यों में हालात सुधारने के लिए क़दम उठाए जाएं.

इन एम्पावर्ड ग्रुप ऑफ़ स्टेट्स (ईएजी) में बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश, ओडिशा, राजस्थान, उत्तरांचल और उत्तर प्रदेश शामिल हैं.

जिन इलाक़ों में अस्पताल में प्रसव, सिज़ेरियन ऑपरेशन और ऐम्बुलेंस सेवाएं कम थीं वहां ऐसी सुविधाओं को लाने की योजनाएं बनाई गईं.

हाल में जननी सुरक्षा योजना और जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम भी लाए गए हैं, जिनके तहत सरकारी स्वास्थ्य संस्थान में प्रसव के लिए जानेवाली गर्भवती महिलाओं को धन राशि, मुफ्त चेक-अप, प्रसव और एक साल तक नवजात की बीमारी का ख़र्च दिए जाने का प्रावधान है.

प्रसव के दौरान मां और बच्चे की जान बचाने के लिए प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी, स्वास्थ्य केंद्र या अस्पताल में डिलिवरी करवाना बेहद ज़रूरी माना जाता है.

स्वास्थ्यकर्मियों की मौजूदगी के चलते प्रसव के दौरान होने वाली जटिलताओं से तो निपटा जा ही सकता है साथ ही नवजात में बीमारियों के लक्षण जल्दी पहचाने जा सकते हैं.

स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय में अतिरिक्त सचिव मनोज झालानी कहते हैं, "भारत ने इस एक पैमाने पर बहुत बेहतरी देखी है, पिछले 12 सालों में इंस्टिट्यूश्नल बर्थ की दर दोगुनी हो गई है."

देश भर में हुए इस बदलाव के बावजूद राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफ़एचएस) 2015-16 बताता है कि बिहार (63.8%) अब भी सबसे बुरे राज्यों में से एक हैं.

केरल (99.9%) और तमिलनाडु (99%) में लगभग हर बच्चा किसी संस्थागत स्वास्थ्य सुविधा में पैदा हुआ.

मनोज झालानी मानते हैं कि, "कुछ हिस्सों में अब भी कुछ अनिच्छा दिखती है" पर साथ ही कहते हैं, "अब हम बच्चों के पैदा होने से जुड़ी सभी सुविधाओं को बेहतर करना चाहते हैं, लक्ष्य योजना के ज़रिए हम प्रसव को मां और बच्चे के लिए एक ख़ुशनुमा अनुभव बनाना चाहते हैं".

युनिसेफ़ की रिपोर्ट के मुताबिक़ अगर बच्चा पैदा होने के बाद एक महीने तक जीवित रहता है तो पाँच साल की आयु तक पहुँचने से पहले निमोनिया और डायरिया से उसे सबसे ज़्यादा ख़तरा रहता है.

भारत में पाँच साल से कम उम्र के बच्चों में निमोनिया की वजहें कुपोषण, पैदाइश के व़क्त कम वज़न, स्तनपान को जल्दी रोक देना, चेचक का टीकाकरण ना होना, प्रदूषण और भीड़भाड़ वाले इलाक़ों में रहना है.

साल 2017 में भारत सरकार ने ऐलान किया कि छोटे बच्चों में निमोनिया की रोकथाम के लिए एक नई वैक्सीन लाई जा रही है.

ये टीकाकरण अभियान को और व्यापक बनाने के लिए लाए गए मिशन इंद्रधनुष का हिस्सा है.

इसका असर तो आनेवाले दिनों में ही पता चलेगा पर फ़िलहाल देश के अलग-अलग इलाकों में टीकाकरण की सफलता अलग रही है.

एनएफ़एचएस 2015-16 के मुताबिक अरुणाचल प्रदेश (38.2%) और असम (47.1%) का पंजाब (89.1%) और केरल (82.1%) से काफ़ी कम है.